आवास का अधिकार है जीने का अधिकार! झुग्गी तोड़ने से पहले पक्के आवास की व्यवस्था सुनिश्चित करो ! संघर्ष से एक कदम पीछे हटी है सरकार पर खतरा अभी टला नहीं है!!

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के कारण दिल्ली भर में लाखों लोगों के सर पर अचानक से आवास का संकट छा गया है। 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के आए एक आदेश के मुताबिक दिल्ली भर में रेलवे लाइन के करीब बसी तकरीबन 48000 झुग्गियों को अगले तीन महीने के भीतर हटाया जाएगा। हालांकि भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के नेतृत्व में चल रहे दिल्ली आवास अधिकार अभियान के चलते जो जनदबाव सरकार पर बना उसके चलते सरकार ने 1 महीने तक इस कदम को लागू करने पर रोक लगाने की बात कही है परन्तु उसके बावजूद भी केशवपुरम और मानसरोवरपार्क में कुछ झुग्गियां तोड़ी जा चुकी हैं।
इन झुग्गियों में आम गरीब मेहनतकश आबादी रहती है, जो सुबह से लेकर शाम तक बमुश्किल किसी तरह दो जून की रोटी का इंतजाम कर जीवन गुजर-बसर कर पा रही है। कोरोना महामारी तथा सरकार द्वारा बिना तैयारी के आनन-फानन में लागू किए गए लॉकडाउन के कारण यहां रह रही आबादी की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब चल रही है, ऐसे में उन्हें उनके आवास से बेदखल कर दिया जाना उनके जीवन जीने के अधिकार पर हमले से कम नहीं है। मोदी सरकार उच्चतम न्यायालय से मजदूरों को बेघर करने का फरमान लेकर आई है। रेलवे की तरफ से अतिक्रमण हटाने को लेकर दायर हलफनामे पर कोर्ट की तरफ से यह आदेश आया है। रेलवे द्वारा बेदखली के लिए विशेष कार्यबल का गठन पहले ही किया जा चुका है। लोगों के ऊपर बल प्रयोग कर उन्हें बेघर किया जाएगा। सरकार चाहती तो पहले लोगों के पुनर्वास का इंतजाम कर सकती थी, लेकिन जनविरोधी सरकार को 48000 झुग्गियों में रहने वाले लाखों लोगों की दिक्कत समस्याएं नज़र नहीं आई।

दिल्‍ली आवास अधिकार अभियान के तहत शकुर बस्‍ती में सभा

इन झुग्गियों में हम आप पिछले कई सालों से रह रहे हैं। हमारे तमाम दस्तावेज मसलन आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, राशन कार्ड, बिजली बिल आदि इसी पते पर से बने हैं। कोर्ट ने हमारे रिहायश का कोई दूसरा इंतजाम किए बिना इन्हें हटवाने का आदेश दिया है। कई लोगों ने सालों की जी तोड़ मेहनत के बाद झुग्गी खरीदी या बनाई है, वे अचानक कहां जाएंगे? उन्हें क्या मुआवजा मिलेगा? आदि जरूरी बातों पर यह आदेश कोई बात नहीं कहता है और ना ही बेदखल हुए लोगों के रिहायश के वैकल्पिक इंतजाम पर कोई बात कही गई है। जस्टिस अरुण मिश्रा, बी आर गवाई और कृष्णा मुरारी की खंडपीठ के द्वारा जारी मौजूदा आदेश साफ तौर पर कहता है कि अतिक्रमण हटाने पर रोक सम्बन्धी किसी भी अदालत द्वारा कोई भी अन्य आदेश मान्य नहीं होगा। गौरतलब है कि, पिछले साल मार्च में इसी तरह के मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट का एक फैसला आया था। रेलवे द्वारा शकूरबस्ती में झुग्गी हटवाने की याचिका पर रोक लगाते हुए कोर्ट ने साफ तौर पर कहा था कि लोगों के पुनर्वास का इंतजाम किए बिना तथा लोगों को स्थान परिवर्तन के लिए पर्याप्त समय दिए बिना, उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता है। यह सिद्धांत किसी भी तरह की बेदखली के लिए लागू होता है। किंतु, सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश इस फैसले से इतर लोगों को बीमारी के समय में आनन-फानन में बेघर करने वाला है। केजरीवाल ने 2015 के चुनाव के समय भी गला फाड़ कर कहा था कि वो सबको पक्के मकान देगा लेकिन सत्ता में बैठने के बाद उसने कुछ भी नहीं किया। इस बार के चुनाव में भी केजरीवाल ने ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ का जुमला उछाला है। लेकिन इस दिशा में काम करने की ना ही उसकी कोई योजना है ना मंशा।

रेलवे केंद्र सरकार के मातहत है। इससे साफ पता चलता है कि केंद्र में बैठी मोदी सरकार के पास झुग्गी वालों को देने के लिए क्या है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हर किसी को पक्का मकान देने की मोदी सरकार की योजना ढकोसला मात्र है, यह लोगों को उनके घर से बेघर करने का काम कर रही है। अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने के नाम पर केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन असल में इस दिशा में कोई काम नहीं किया जा रहा है। राज्य व केंद्र सरकार एक दूसरे पर दोष मढ़ जिम्मेदारी से बच रही हैं।

दोस्तों, आवास के अधिकार के बिना जीने के अधिकार की बात करना बेमानी है। दिल्ली आवास अधिकार अभियान पिछले लंबे समय से दिल्ली की आम मेहनत-मशक्कत करने वाली आबादी के आवास के अधिकार के लिए चलाया जा रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में ही लाखों-लाख गरीब आबादी बेहद अमानवीय परिस्थिति में रहती है। कई लाख लोग फुटपाथ पर जीवन गुजर बसर करते हैं। हमारा स्पष्ट तौर पर मानना है कि सरकार द्वारा हर किसी के स्थाई पक्का आवास का इंतजाम किया जाना चाहिए। और यह मांग कोई शेख चिल्ली का सपना नहीं है, ऐसा करना वाकई सम्भव है। शहर के कितने ही खाली अपार्टमेंट्स खड़े हैं, जिनमें रहने के लिए लोग नहीं हैं, उनमें एक बहुत बड़ी बेघर आबादी को बसाया जा सकता है, और दूसरी तरफ करोड़ों लोग झुग्गी झोपड़ियों तथा फुटपाथ पर रहने के लिए मजबूर हैं। हर किसी को आवास मुहैया कराने के लिए संसाधनों की कोई कमी नहीं है। इसके लिए हमें संगठित होकर नीचे से सरकारों पर दबाव बनाने की आवश्यकता है।

दिल्‍ली आवास अधिकार अभियान के तहत वज़ीरपुर में सभा

दिल्ली आवास अधिकार अभियान हर किसी को पक्का व स्थाई रिहायश उपलब्ध कराए जाने के मकसद से चलाया जा रहा है। आज अचानक से लाखों लोगों के सामने बेघरी की समस्या सामने आ खड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के मौजुदा आदेश के खि़लाफ़ भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी, दिल्ली आवास अधिकार अभियान तथा अन्य क्रान्तिकारी यूनियनें व जनपक्षधर संगठन पुनर्विचार याचिका दायर कर रहे हैं। आज ऐसे समय में हमें भी बिना देर किए संगठित होकर अपने आवास की मांग को उठाना होगा। स्थाई और पक्का आवास हमारा मूलभूत अधिकार है।

हम झुग्गी वालों के मेहनत के दम पर ही शहर में रौनक है, और हमें ही भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है। आखिर कब तक हमलोग एक आदेश से लेकर दूसरे आदेश के बीच झूलते रहेंगे? आखिर कब तक इन सरकारों के झूठे वादों के नीचे हमलोग पिसते रहगें? पटरियों पर भी हमीं मरते हैं, और हमें ही बेदखल किया जाता है। अगर आज हम अपनी मांग नहीं उठाते हैं तो कल इसका खामियाजा हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतना होगा। एक महीने के अंदर हमें सरकार पर दबाव बनाना होगा कि हमारे लिए आवास का इंतजाम करे।