दिल्ली में केजरीवाल ने दिया फैक्टरी मालिकों को तोहफा

एक तरफ जहाँ देश स्तर पर मोदी सरकार मजदूर विरोधी नीतियों को नंगे तौर पर लागू कर टाटा-बिड़ला-अम्बानी सरीखे पूँजीपतियों की सेवा में लगी हुई हैं_ वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के मुख्यमन्त्री केजरीवाल और उनकी सरकार भी दिल्ली के व्यापारियों और फैक्ट्री मालिकों की समस्याओं को लेकर बड़ी चिन्तित रहती है।

हाल ही में दिल्ली की अर्थव्यवस्था में सुधार के नाम पर केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के फैक्ट्री मालिकों के लिए तमाम भुगतान की बकाया राशि में 50 फीसदी तक छूट देने की ‘वन टाइम एमनेस्टी स्कीम’ (आम माफी योजना) लागू की है। इस योजना के तहत मालिकों के लिए ग्राउंट रेंट (किराया) , लीज रेंट समेत कई तरह के चार्ज भुगतान देरी होने पर पेनल्टी पर लगने ब्याज दरों को काफी कम दिया गया है। केजरीवाल सरकार इस प्रश्न पर इतनी चिंतित है कि 23 अगस्त को केजरीवाल ने दिल्ली के व्यापारियों और फैक्ट्री मालिकों से डिजिटल संवाद कर उनकी समस्याऐं सुनी और समाधान पर बात भी की।

परन्तु दिल्ली के फैक्ट्री मालिकों और व्यापारियों की सेवा में जी-जान से जुटी केजरीवाल सरकार को दिल्ली के मेहनतकशों-मजदूरों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं हैं। दिल्ली में बवाना, नरेला, वजीरपुर, करावल नगर सहित अधिकतर औद्योगिक इलाकों में न्यूनतम मजदूरी सहित कोई भी श्रम-कानून लागू नहीं होता हैं। दिल्ली की बहुसंख्यक मजदूर आबादी के पास कोई राशन कार्ड न होने के कारण उन्हें कोई मुफ्त राशन नहीं मिल रहा हैं, कोरोना महामारी के इस दौर में काम-धंधा मन्दा होने के कारण काम भी जल्दी नहीं मिल रहा है पर केजरीवाल को दिल्ली के व्यापारियों, मालिकों के कम हो रहे मुनाफे की चिंता ज्यादा है।

पिछले दिनों केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में नौकरी ढूंढ़ने वाले और नौकरी देने वाले को मिलाने बात करते हुए एक ‘ऑनलाइन रोजगार बाजार’ शुरू किया। रोजगार बाज़ार की घोषणा करते समय की गई प्रेस वार्ता में केजरीवाल ने फैक्ट्री मालिकों-ठेकेदारों और बेरोजगार नौजवानों-मजदूरों को एक दूसरे से सम्पर्क कराने की इस योजना का लम्बा-चौड़ा बखान तो किया, पर इस वार्ता में श्रम-कानूनों को लागू करने के सन्दर्भ में कोई बात ही नहीं की गई। असल में इस योजना की सारी कवायद यह थी कि दिल्ली के फैक्ट्री मालिकों-ठेकेदारों और व्यापारियों को इस ‘ऑनलाइन रोजगार बाजार’ के माध्यम से आसानी से कम वेतन पर खटने वाले मज़दूर मिल जायें।

उदाहरणार्थ बवाना की बात करें तो यहां पर 2018 में पटाखा फैक्ट्री में आग लगने के बाद से भी अब तक कोई बदलाव नहीं आया है। पूरे बवाना के सेक्टर-1 से 5 तक मे भी जाएंगे तो किसी भी फैक्ट्री में 7000 से ज्यादा वेतन नही मिलेगा और औरतों को तो 5000 ही मिलते है। ज्यादातर कारखानों में जबरिया ओवरटाइम करवाया जाता है, जिसका भुगतान वेतन के मुताबिक होता है। दूसरी तरफ केजरीवाल साहब पूरी दिल्ली में प्रचार कर रहे है कि पूरे भारत मे दिल्ली में न्यूनतम वेतन सबसे ज्यादा है। आए-दिन कारखानों में आग लगती रहती है और साथ ही मजदूरों को काम पर से निकाले जाने का ड़र हमेशा बना रहता है। वहीं दिल्ली के श्रम मंत्री का कहना है कि पूरे दिल्ली में सिर्फ 160 आर्थिक इकाइयां है जहाँ श्रम कानून लागू नही होता। बीते दिनों जब यूनियन के साथ बवाना के मजदूरों ने श्रम विभाग में श्रम कानूनों को लागू कराने के लिए ज्ञापन दिया तो लेबर कमिश्नर का कहना था कि अब कारखानों में चेकिंग नही होंगी, ये ऊपर से आदेश है। हालात अब यह है कि अब ये खुले तौर पर मालिकों का साथ दे रहे है।

आप अभी भूले नही होंगे कि लॉकडाउन में भी केजरीवाल ने मजदूरों के साथ कितना भद्दा मजाक किया। राशन देने के नाम पर 1 किलो चावल और 4 किलो गेंहू महीने भर के लिए दिया जा रहा था, जो बिल्कुल ही नाकाफी था और स्कूलों में जो भोजन मिल रहा था वो तो ऊंट के मुंह मे जीरे के समान था। दूसरी तरफ मालिकों ने किसी भी मजदूर को लॉकडाउन के वेतन का भुगतान नही किया। यही मुख्य कारण थे जिस वजह से दिल्ली से भी बड़ी मजदूर आबादी गाँव जाने के लिए मजदूर हुई। एक तरफ नौजवान-मजदूर काम की तलाश में इधर से उधर दौड़ रहे हैं और कारखानों के भीतर मर रहे है तो दूसरी तरफ मजदूर विरोधी मोदी सरकार को ‘हम मिलकर काम करेंगे जी’  का संदेश देते हुए केजरीवाल भी दिल्ली के मालिकों-व्यापारियों की सेवा में तत्परता से लगे हुए है।

साथियों! अब यह व्यवस्था हमें और हमारे भविष्य को गुलाम बनाने की तरफ ढ़केल रही है। अब सवाल हमपर है कि कब तक हम सब सहते हुए चुप बैठेंगे? हमें वर्गीय एकजुटता बनानी होगी तभी हम सब मिलकर श्रम कानून लागू करवाने से लेकर व्यवस्था तक बदल सकते है। इसके लिए जरूरी है कि संगठित हुआ जाए।