कारखानों के भीतर से

PAL द्वारा ‘अन्‍वेषण’ के दौरान ली गई तस्‍वीर

पूरे बवाना औद्योगिक क्षेत्र में करीब 12000 से 15000 कारखाने हैं। इनमें से 70 कारखाने बगैर पंजीकरण के चल रहे हैं। आज रोजगार के हालात क्या है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बवाना के सेक्टर-5 में 4000 के करीब कारखाने है और यहां सिर्फ 250 करीब कारखानों में काम करने के लिए जगह खाली है। वह भी तब जब 20-30 प्रतिशत मजदूर लॉकडाउन के कारण गांव गए हैं और अब उनके वापस आने की शुरुआत भी हो चुकी है। ए से पी ब्लॉक तक एक-एक गली छानने के बाद भी सिर्फ इतनी ही नौकरियां यहां है।

दूसरी तरफ मजदूरों के वेतन में मालिकों ने 1000  की कटौती की है। अब बवाना में मजदूरों की तनख्वाह 7000रुपए है, 8 घंटे की और 4 घंटे ओवरटाइम लगाने के बाद कुल 9000 रुपए  तक बमुश्किल बनते हैं। यह ऊपर बताई गई 8 घंटे की तनख्वाह तो सिर्फ पुरुषों की है, महिलाओं को 8 घंटे की पगार 6000 रुपए मिलती है। एक तरफ बेरोजगारी अपने चरम पर है, तो एक तरफ जहां काम मिल रहा है या जो मजदूर काम कर रहे हैं वहां से 8 घंटे काम का नियम ही लुप्त हो चुका है। दीया लेकर ढूंढने पर भी 8 घंटे का काम नहीं मिलेगा। मजदूरों को भी मजबूरी में 12 घंटे काम करना पड़ता ही है, क्योंकि सात हजार में घर तो चलने वाला नहीं है। मजदूरों के लिए ई-एस-आई, पीएफ की तो बात अब एक भूली बिसरी यादें हो चुकी है। मालिक भी ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा काम ठेके पर करवा रहे हैं। ये तो हुई औद्योगिक क्षेत्र की बात, पर अंदर के हालात तो और भी भयावह है।

इन कारखानों के भीतर हवा के नाम पर सिर्फ मशीनों से निकला धुआँ ही बचा है, जो 200 फीट लंबे हॉल में धुएँ के निकास ना होने के कारण हर समय मौजूद रहता है। एक हल्की धीमी जलने वाली टड्ढूबलाइट की रोशनी से ही सबकुछ देखना पड़ता है। इतने बड़े हॉल में सिर्फ एक पंखा, जिससे उमस और धूल से मिश्रित एक अजीब चिपचिपाहट शरीर में पैदा होती हैं। इसके अलावा कोरोना काल में भी फैक्ट्री की तरफ से कोई मास्क सैनिटाइजर उपलब्ध नहीं कराए जाते। सुरक्षा के अन्य साधनों की बात ही क्या करें, जब दस्ताने और जूते तक नहीं मिलते। कहीं अगर फैक्ट्री में आग लगती है तो जिंदा रहने के कम ही मौके मिलते हैं। पर हर फैक्ट्री में एक केबिन होता है जहां मालिक आराम से ऐसी में सोता है। हर तरफ कैमरे लगे हैं ताकि मजदूर दो मिनट आराम भी ना कर सके।

ऊपर से लेबर कमिश्नर यह कहते हैं कि अब फैक्ट्री में कारखाना इंस्पेक्टर जांच करने नहीं जाएगा। मजदूरों को कुछ दिक्कत है तो केस करें। अगर केस की बात करें, तो 2014 के वजीरपुर हड़ताल के बाद मजदूरों के मालिकों के खिलाफ कई केस आज तक चल रहे है। यह दिगर बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि लॉकडाउन की तनख्वाह देने के लिए मालिक बाध्य नहीं है।

यह हाल तब है जब अभी श्रम कानून कागज़ में बचे हैं। फासीवादी मोदी सरकार द्वारा इसे खत्म करने की योजना का मकसद ही यही है कि इस नंगई को कानूनी अमली जामा पहनाया जाए। दूसरी तरप़फ़ खुद को मज़दूरों का संरक्षक बताने वाली केजरीवाल सरकार भी सिर्फ प्रचार में पैसे खर्च कर रही है कि उसने मजदूरों की तनख्वाह बढ़ा दी, पर हकीकत से यह कोसो दूर है।

पूंजीवाद का यही अंतर्विरोध है कि एक तरफ बेरोजगारों की फौज और दूसरी ओर जानवरों जैसे हालात में काम करते मेहनतकश लोग। आने वाले दौर में ऐसे ही अंतर्विरोध पूंजीवाद को उसकी कब्र तक ले जाएंगे, बस हमें वर्गीय एकजुटता बनाकर इसे एक धक्का जोर से देना होगा।