गांव-देहात की मेहनतकश आबादी के हालात और उनके लिए भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी का एजेण्डा

गांव-देहात की मेहनतकश आबादी के हालात और उनके लिए भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी का एजेण्डा

जैसा कि हम जानते हैं, पूँजीवादी व्यवस्था में एक मजदूर को सिर्फ इतना दिया जाता है जिससे वह मर-मर कर जि़न्दा रह सके। लेकिन आज के पूँजीवादी समाज में बेरोज़गारी, बेकारी, भुखमरी, गरीबी के चलते एक मज़दूर को इतना भी नहीं मिल पाता की वह उससे, खुद को और अपने परिवार को जिन्दा रख सके। आज अगर हम ग्रामीण मज़दूरों के हालातों पर एक नजर दौड़ाएँ तो हम पाते हैं कि आज गाँव में रहने वाले मज़दूर ज़्यादातर खेतिहर मज़दूर, भट्ठा मज़दूर, मिस्त्री या दुकान व मण्डियों में काम करने वाले मज़दूर हैं। इस प्रकार का काम मज़दूर अपने गाँव या अपने आस-पास के गाँव-शहर में करते हैं। हम देख सकते हैं की इस प्रकार का काम कोई स्थायी काम नहीं होता। ये सभी काम सीज़न या मौसम के हिसाब से होते हैं। इसलिए उनको अपना ज़्यादा समय घर पर ही बिताना पड़ता है। ऐसे में समझा जा सकता है कि गाँव में रहने वाली एक बहुत बड़ी मज़दूर आबादी को ग़रीबी, भुखमरी, बेकारी, बेरोज़गारी में ही अपनी जि़न्दगी गुज़ारनी पड़ती है। लेकिन अगर हम मान भी लें की इस प्रकार का काम मज़दूरों को मिल भी जाता है तो किन हालातों में उनको यह काम करने पर मजबूर होना पड़ता है यह भी हमें जानने की कोशिश करनी चाहिए।

गाँव के ईंट भट्ठा मज़दूरों की हालत

भट्ठा मज़दूरों की बात करें तो उन्हें बहुत बुरे हालात में काम करने पर मजबूर होना पड़ता है। वे हर दिन कम से कम दस या उससे ज़्यादा घण्टे काम करते हैं। मज़दूरों को यह काम ठेकेदारी प्रथा के तहत करना पड़ता है। भट्ठे के काम को करवाने के लिए भट्ठे का मालिक ही इसमें ठेकेदार की भूमिका निभाता है। यह काम भी कोई परमानेण्ट काम नहीं होता क्योंकि पूरे साल के दौरान भट्ठा केवल छः महीने ही चलता है बाकी के छः महीने वह बन्द रहता है। इसकी वजह से मज़दूरों को छः महीने अपने घर बैठना पड़ता है। काम के दौरान जो एक मज़दूर को उसकी सेफ्टी के लिए जो जरूरी समान दिया जाना चाहिए वह भी उनको नहीं दिया जाता। इन हालात में काम करने के बाद भी मज़दूरों को न्यूनतम वेतन तक नहीं मिलता। बिना सेफ्टी के काम करते मज़दूरों को जिन बीमारियों का सामना करना पड़ता है उन बीमारियों के इलाज का कोई भी पैसा मज़दूरों को नहीं मिलता। इससे पता चलता है कि भट्ठा मालिक द्वारा मज़दूरों पर एक भी श्रम कानून लागू नहीं किया जाता।

इन मज़दूरों का कहना है कि भयंकर बेरोज़गारी के कारण उन्हें इतने बुरे हालात में भी काम करना पड़ता है। अगर वे काम नहीं करेंगे तो उनके बच्चे और वे भूखे मर जाएँगे। इसलिए उनको काम करने पर मजबूर होना पड़ता है।

मनरेगा मज़दूरों की हालत

इसी प्रकार के मिलते-जुलते हालात दूसरे क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों के भी हैं। अगर हम मनरेगा की जाँच-पड़ताल करें तो देखते है कि मनरेगा कानून के अनुसार 100 दिन काम की योजना है, लेकिन असल में ना तो मजदूरों को सौ दिन काम मिलता है और ना ही पूरी मेहनत का हिसाब मिलता है। कानून की किताबों में नये-नये कानून तो बनते हैं, किन्तु व्यवहार में कोई भी लागू नहीं होता। मेहनतकश वर्ग हर जगह शोषण का शिकार है। साथ ही ‘डिजिटल इण्डिया’ के नाम पर मज़दूरों की दिहाड़ी मोबाइलों में डाली जाती है। अब सवाल यह है कि मज़दूर अपना काम करेगा या फिर सिम कार्ड से अपने पैसे निकलवाने इधर-उधर भटकेगा। दूसरी बात यह कि मोदी सरकार के आने के बाद से मनरेगा में नये-नये बदलाव कर दिये गये हैं, जिनके बारे में मज़दूरों या उनकी यूनियन से बिना सलाह वेतन का भुगतान कार्यदिवस की जगह कार्य की पैमाइश के अनुसार किया जा रहा है। इस बदलाव से कई जगह ऐसा हुआ, जहाँ मज़दूरों ने 8 घण्टे काम किया, लेकिन पैमाइश के अनुसार उनको भुगतान 150 रुपये ही मिले, जबकि हरियाणा में मनरेगा मज़दूरी कार्यदिवस के अनुसार 281 रुपये है। वहीं अभी हाल की रिपोर्ट के अनुसार मोदी सरकार ने मनरेगा के तहत मजदूरी में सिर्फ 2.16 फीसदी की औसत बढ़ोत्तरी की है। छह राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में मज़दूरी में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। 15 राज्यों में एक रुपये से लेकर पाँच रुपये की बढ़ोतरी की गई है।

सरकारी दावों की बात करें तो मनरेगा कानून 2005 कहता है कि इसका मकसद है ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी बेरोज़गारी को कम करना। यानी कानून के तहत 1 वर्ष में परिवार के वयस्क सदस्यों को 100 दिन के रोज़गार की गारण्टी दी जायेगी। रोज़गार के पंजीकरण के 15 दिन के भीतर काम देने और काम ना देने की सूरत में बेरोज़गारी भत्ता देने की बात कही गयी है। मनरेगा के तहत न्यूनतम मज़दूरी भी अलग-अलग राज्यों के हिसाब से तय की गयी है। हरियाणा में अभी फि़लहाल 281 रुपये तय की गयी है।

मनरेगा के बजट की रकम भारी-भरकम होती है, जैसे 2017-18 में मनरेगा के लिए 48 हज़ार करोड़ दिये गये। लेकिन इसकी ज़्यादातर रकम दूसरी योजनाओं में ख़र्च कर दी जाती है। वैसे भी पूरे देश में मनरेगा के तहत साल में सिर्फ 46 दिन औसत काम मिलता है। कागजों पर ज़रूर ये योजना ग्रामीण मजदूरों के लिए कल्याणकारी लगती है, लेकिन असल मकसद है गाँव से आबादी का पलायन रोकना। क्योंकि खेती में लगातार मशीनीकरण के कारण गाँव की ग़रीब आबादी में तेज़ी से बेरोज़गारी फैल रही है। ऐसे में कोई भी सरकार शहरी बेरोज़गारों की संख्या में इससे ज़्यादा बढ़ोत्तरी सहन नहीं कर सकती, क्योंकि वह शहरों में सामाजिक असन्तोष को बढ़ाएगा। इसलिए ऐसी योजना से सरकार चाहती है कि गाँव से आने वाले सम्भावित प्रवासियों को अर्द्धभुखमरी की हालत में, यानी सौ दिन के रोज़गार के साथ, अभी कुछ और समय तक गाँव में ही रोके रखा जाये। मनरेगा की योजना का बस यही मक़सद था।

गाँव के ग़रीब मज़दूरों व ग़रीब किसानों को क्या करना चाहिए?

ऐसे में गाँव-देहात की मज़दूर आबादी के बीच पूरे साल के पक्के रोज़गार के लिए संघर्ष की शुरुआत की जानी चाहिए। चुनाव के समय पूरे पूँजीपति वर्ग की सेवा करने वाली सभी चुनावबाज़ पार्टियाँ इन मज़दूरों के बीच वोट की भीख माँगने आती है और साथ में मज़दूरों से बड़े लम्बे-चौड़े वायदे करती है ताकि मज़दूरों का वोट अपने पक्ष में लिया जा सके। लेकिन असल में वह सत्ता में आने के बाद भूस्वामियों, धनी किसानों और पूँजीपतियों की नीतियों को आगे बढ़ाते हुए उन्हीं की सेवा करती है। चूँकि ये सभी पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियाँ जैसे कि भाजपा, कांग्रेस, इनेलो, सपा, बसपा बड़े, मँझोले और छोटे पूँजीपतियों, भूस्वामियों, आढ़तियों, ठेकेदारों व धनी किसानों के धनबल से चलती हैं, इसलिए वह गाँव के ग़रीब किसानों और मज़दूरों के लिए कुछ भी नहीं कर सकतीं। यही बात समझकर देश के मज़दूरों और ग़रीब किसानों ने अपनी नयी पार्टी बनायी है-‘भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी’ (RWPI)। यह पार्टी पूरी तरह मज़दूरों व ग़रीब किसानों के सहयोग व चन्दे से चलती है। इसका नेतृत्व मज़दूर व मेहनतकश के आन्दोलन से ही पैदा हुआ है। यही कारण है कि गाँव के ग़रीब किसानों और मज़दूरों के हक़ों के लिए केवल और केवल यही पार्टी लड़ सकती है। इसलिए आज मज़दूर पार्टी गाँव-देहात के ग्रामीण मज़दूरों की माँगों को लेकर मेहनतकश आबादी को संगठित कर रही है। आने वाले चुनावों में यदि मज़दूर पार्टी (RWPI) का उम्मीदवार जीतकर संसद में जाता है तो वह निम्न माँगों की पूर्ति के लिए काम करेगाः

  1. जमीन का राष्ट्रीकरण किया जाये और जिन भी खेतों को जोतने का काम स्वयं किसान अपनी और अपने परिवार की मेहनत से नहीं करती, बल्कि नियमित तौर पर उजरती मज़दूरों से करवाती है, उसका सामूहिकीकरण कर खेतिहर मज़दूरों व ग़रीब किसानों के समूहों को साझी खेती के लिए सौंप दिया जाये या उन्हें मॉडल सरकारी फार्मों में तब्दील कर दिया जाये। ज़मीन किसी की निजी सम्पत्ति नहीं हो सकती है, यह एक प्राकृतिक संसाधान है जिसे किसी मनुष्य ने पैदा नहीं किया है। इसलिए इस पर समूचे देश का साझा हक़ है।
  2. सभी खेतिहर मज़दूरों के कार्य को श्रम कानूनों के मातहत लाया जाये और उनके कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए श्रम विभाग के उपयुक्त ढाँचे का निर्माण किया जाये।
  3. बिना काम के अधिकार के संविधान में महज़ जीने का अधिकार लिख देना जनता के साथ एक बेशर्म धोखा है। काम के अधिकार को मूलभूत अधिकारों में शामिल किया जाये। इसके लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधन किया जाये और ‘भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी अधिनियम’ पारित किया जाये, जिसके तहत साल भर के पक्के रोज़गार की गारण्टी सरकार ले अथवा प्रति माह रु. 10,000 बेरोज़गारी भत्ता दे।
  4. वस्तु के रूप में मज़दूरी के भुगतान पर पूरी रोक लगायी जायेगी और हर उद्योग में मज़दूरी के भुगतान की नियत मासिक तिथि तय की जायेगी।
  5. गाँवों में साफ़ पीने के पानी की समुचित व्यवस्था की जायेगी।
  6. शौचालयों समेत साफ़-सफ़ाई की पूरी व्यवस्था की जायेगी।
  7. समस्त सुविधायुक्त अस्पतालों व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का निर्माण किया जायेगा।
  8. विभिन्न प्रकार के समारोहों के लिए सुविधासम्पन्न सामुदायिक केन्द्रों का निर्माण किया जायेगा।
  9. गाँव की ग़रीब आबादी के लिए निशुल्क पुस्तकालयों और व्यायामशालाओं का निर्माण किया जायेगा।

यदि मज़दूर पार्टी (RWPI) आने वाले लोकसभा चुनावों में विजयी होती है, तो उसके सांसद इन सभी माँगों को पूरा करने के लिए संघर्ष करेंगे। जो माँगें पूरी करना सांसद के अधिकार क्षेत्र में है, उन्हें तत्काल पूरा किया जायेगा।

इसलिए हम सभी ग्रामीण मज़दूर व ग़रीब किसान भाइयों और बहनों से अपील करते हैं किः

  1. मज़दूर पार्टी (RWPI) के वालण्टियर बनें और उसकी प्रचार कार्रवाइयों में हिस्सा लें।
  2. मज़दूर पार्टी को हर प्रकार का आर्थिक और भौतिक सहयोग दें।
  3. मज़दूर पार्टी को सभी ग़रीब मज़दूर व ग़रीब किसान मिलजुलकर एकजुट होकर वोट दें।