मोदी सरकार के दौर में न्यायपालिका की हालत

मोदी सरकार के दौर में न्यायपालिका की हालत

हाल में ही एक मसला सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए आया है, जिससे पता चलता है कि मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था में सबसे पवित्र निकाय माने जाने वाले न्यायपालिका की हालत क्या हो चुकी है और उसकी असलियत क्या है।

सर्वोच्च न्यायालय में 2009 से ही एक याचिका दायर थी जिसके तहत पूछा गया था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति को सूचना के अधिकार के तहत क्यों नहीं लाया जाना चाहिए। मौजूद नियुक्ति की व्यवस्था में कोई पारदर्शिता नहीं है और जनता का इस प्रक्रिया पर कोई नियन्त्रण नहीं है। ऐसे में, विभिन्न शासक पार्टियाँ इन नियुक्तियों का उपयोग अपने हितों के अनुसार करती रही हैं। पहले भी ऐसा हुआ है, लेकिन फ़ासीवादी मोदी सरकार के दौर में जिस नंगेपन के साथ इस प्रक्रिया को अंजाम दिया गया है, उसने पूँजीवादी न्यायपालिका के चेहरे पर निष्पक्षता और न्यायपूर्णता का जो पर्दा था वह लगभग उतार ही दिया है। हालत यह हो गयी कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को ही प्रेस कान्फ्रेंस  करके मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका के साथ हो रही छेड़छाड़ पर आपत्ति रखनी पड़ी! ये समझदार न्यायाधीश थे, जिन्हें यह पता था कि यदि न्यायपालिका पर से जनता का भरोसा पूरी तरह उठ गया तो यह पूँजीवादी व्यवस्था के लिए बेहद ख़तरनाक होगा।

लेकिन अभी जो मसला सामने आया है, उसने न्यायपालिका की निष्पक्षता और पारदर्शिता की सच्चाई और साथ ही मोदी सरकार के न्यायपालिका को लेकर नापाक इरादों को पूरी तरह बेपर्द कर दिया है।

सरकार के प्रतिनिधि एटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने इस याचिका का विरोध करते हुए सर्वोच्च न्यायलय की बेंच के सामने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि इससे “संवेदनशील बातें” खुल जाएँगी! ज़रा सोचिये कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सरकार और न्यायपालिका के बीच कौन-सी संवेदनशील बातें होतीं हैं!? ज़ाहिर है, शासक वर्गों के हितों के लिए न्यायपालिका के फ़ैसले और उसका हस्तक्षेप बाधा न बने, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार और न्यायपालिका के बीच तमाम मन्त्रणाएँ होती होंगी। ज़ाहिर है कि कोई भी शासक वर्ग ऐसी “अन्दरूनी बातों” और “संवेदनशील बातों” को जनता के सामने खोलना नहीं चाहेगा!

सरकारी वकील के इस तर्क पर न्यायपालिका ने एक प्रकार से सहमति ही जता दी है। क्यों? क्योंकि एक दूसरा मसला भी न्यायपालिका में उठा हुआ है। वह मसला है जजों की सम्पत्ति के विषय में जानकारी को जनता के लिए खुला करना और इसे सूचना के अधिकार के मातहत लाना! इस पर भी न्यायपालिका और सरकार एक प्रकार की सहमति में नज़र आ रहे हैं! कहा जा रहा है कि इससे जजों की निजता ख़तरे में पड़ जायेगी! आम जनता के तो घरों के भीतर खुफियागीरी करने, उनके ईमेल, फेसबुक आदि पर निगाह रखने, उनके बैंक खातों पर निगाह रखने, उनके फ़ोन टैप करने में भी निजता का अधिकार भंग होता नहीं दिखता है सरकार और न्यायपालिका को, लेकिन जजों की सम्पत्ति को सूचना के अधिकार के तहत लाने से ही उनकी निजता भंग हो जाती है! सम्पत्ति की जानकारी को सार्वजनिक करने से कैसी निजता भंग होती है? ज़ाहिर है, मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के तीनों ही अंग यानी सरकार, नौकरशाही-सेना-पुलिस तथा न्यायपालिका आपस में मित्रतापूर्ण सहकार के साथ काम करते हैं। लेकिन ऐसा वे जनता के हितों में नहीं बल्कि जनता के विरुद्ध करते हैं। कारण यह है कि शोषकों और शोषितों में कोई एकता या सहकार नहीं हो सकता है। शोषकों के बीच गहरा सहकार बना हुआ है। सवाल यह है कि क्या हम मेहनतकश और मज़दूर अपनी वर्ग एकजुटता और संगठन बनाने के लिए तैयार हैं या नहीं? जब तक हम इसके लिए तैयार नहीं होंगे तब तक अपने तमाम निकायों से मौजूदा शासक वर्ग और उसकी व्यवस्था हमें लूटती रहेगी। इसलिए भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी सभी मज़दूरों, कर्मचारियों, ग़रीब किसानों व आम निम्न मध्यवर्ग के लोगों का आह्वान करती है कि आप मज़दूर पार्टी से जुड़ें और शासक वर्ग के संगठन के बरक्स अपना फौलादी और मज़बूत संगठन बनाएं।