लोकसभा चुनाव में बवाना के मज़दूरों-महनतकशों का एकमात्र विकल्पः भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी को जिताओ!
लोकसभा चुनाव में बवाना के मज़दूरों-महनतकशों का एकमात्र विकल्पः भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी को जिताओ!
बवाना औद्योगिक क्षेत्र में पिछले साल 17 मज़दूर जलकर मर गए थे। मरने वालों में अधिकतर महिला मज़दूर थीं। इनमें एक बच्ची और एक गर्भवती महिला भी थी। इस मौत के तांडव के खि़लाफ़ लोगों का गुस्सा सड़कों पर बह निकला और 3 मार्च को मज़दूरों ने बवाना बन्द भी किया। लेकिन आज तक फैक्टरियों में आग लगना बन्द नहीं हुआ है। हर साल बवाना में करीब 450 फैक्टरियों में आग लगती है और इनमें से कई हादसों में मज़दूर जलकर मर जाते हैं। फैक्टरियों में काम करते वक्त भी मज़दूरों के खून को रोज़-रोज़ फैक्टरियों में जलाकर उन्हें एक धीमी मौत दी जाती है। महिला मज़दूर इन फैक्टरियों में महज़ 4000 से 5000 रुपये में घण्टों काम करती हैं। पुरुष मज़दूरों को 12 घंटे काम करने के बाद महज़ 7000 से 9000 रुपये के बीच ही वेतन मिलता है। ऊपर से अक्सर मज़दूरों का पैसा ठेकेदार लेकर भाग जाता है। श्रम कानून का खुला उल्लंघन होता है, न तो मज़दूरों के काम के घंटे की कोई सीमा है, न न्यूनतम वेतन मिलता है। फैक्टरी एक्ट के अनुसार सुरक्षा नियमों का भी खुला उल्लंघन होता है। बवाना के पांचों सेक्टर में मज़दूरों की जिंदगी नर्क है जहां लेबर इंस्पेक्टर और फैक्टरी इंस्पेक्टर द्वारा जांच के नाम पर महज़ जुबानी जमा खर्च होता है। क्योंकि आम आदमी पार्टी की सरकार और श्रम विभाग मालिकों की गोद में बैठा हुआ है और खुद मालिकों के लिए ही काम करता है। यही कारण है कि आम आदमी पार्टी के सरकार के श्रम मन्त्री गोपाल राय ने सरेआम सरासर झूठ बोलते हुए कहा कि दिल्ली में केवल 160 कारखानों में श्रम कानून नहीं लागू हो रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि बवाना के हज़ारों कारखानों में कोई श्रम कानून लागू नहीं होता है।
मैट्रो विहार या बवाना के आसपास गांव में रहने वाले मज़दूरों की जिंदगी भी बेहाल है। मैट्रो विहार और बवाना जेजे कॉलोनी दिल्ली में जगह-जगह झुग्गियां उजाड़कर बसाई गईं थी। परन्तु अभी तक भी हालत यह है कि पीने का पानी लोगों को खरीदना पड़ता है और इलाके में केवल उन घरों में पानी की सुविधा है जहां पर लोगों ने सब्मर्सिबल मोटर लगाए हैं।
पूरे बवाना में अस्पताल नहीं है। सबसे करीब नरेला में एक डिस्पेन्सरी है जहां रोज़ डॉक्टर नहीं बैठता है। जन-यातायात की सुविधा यहां न के बराबर है। केवल दो बसों का रूट ही लोगों को दिल्ली से जोड़ता है। किसी भी किस्म के सरकारी दफ्तर बवाना की जनता के पास नहीं है। इस हालत में उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के सांसद ने केवल बस स्टैंड के सामने एक ओपन जिम बनवाया है और रेलवे स्टेशन के सौंदर्यीकरण पर पैसा खर्च किया है! उन्होंने मज़दूरों की जिंदगी की हालत के बारे में चूँ तक नहीं किया। जब हमारे साथी फैक्टरियों में जलकर मरे तब भी तथाकथित दलितों के मसीहा सांसद डॉक्टर उदित राज ने इसपर कुछ न बोला। जाहिर है कि उदित राज जैसे दलित नेता केवल अमीर दलितों की बात करते हैं, ग़रीब मेहनतकश दलित की नहीं। मौजूदा सांसद उदित राज ने आग में मज़दूरों की मौत पर न सिर्फ कुछ नहीं बोला बल्कि हर चुनावबाज पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। भाजपा की मेयर तो यह बोलते हुए टीवी पर पकड़ी गयी कि वह इस मसले पर कुछ नहीं बोलेंगी। ये पूंजीवादी चुनावी पार्टियां कुछ बोलेंगी भी नहीं क्योंकि बवाना के फैक्टरी मालिक ही चुनावबाज पार्टियों को चंदा देते हैं।
आज तक बवाना के मज़दूरों के पास कोई विकल्प नहीं था। लेकिन आज वह मज़दूर विकल्प पैदा हो चुका हैः भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी, जिसे बनाने वालों में बवाना के मज़दूर आन्दोलन के सक्रिय राजनीतिक संगठनकर्ता व नेता भी शामिल हैं! इसलिए बवाना के मज़दूरों के सामने आज विकल्प बिलकुल साफ हैः एक तरफ बवाना के मालिकों के चंदे पर चलने वाली और उनके लिए नीतियां बनाने वाली पार्टियां और दूसरी तरफ मज़दूरों-मेहनतकशों की पार्टी, यानी, भारत की क्रांतिकारी मज़दूर पार्टी!
केवल मज़दूर पार्टी (RWPI) का सांसद ही आपकी नुमाइन्दगी क्यों कर सकता है?
भारत की क्रांतिकारी मज़दूर पार्टी का सांसद ही बवाना के मज़दूरों के मुद्दों को लेकर लड़ सकता है। क्योंकि यही एकमात्र पार्टी है जो अपना पूरा खर्चा आम मेहनतकश जनता के बीच से जुटाती है और किसी भी पूंजीवादी कम्पनी, देशी-विदेशी फंडिंग एजेंसी, एनजीओ से उसूलन एक भी पैसा नहीं लेती है। पार्टी का मकसद इस मुनाफा-आधारित पूंजीवादी व्यवस्था का ख़ात्मा कर मज़दूर राज स्थापित करना है। यह कार्य संसद के रास्ते ही नहीं हो सकता है लेकिन इस मकसद को अंजाम देने के लिए संसद के भीतर भी मज़दूर वर्ग की आवाज़ पहुँचानी होगी। संसद के अंदर जिन देशव्यापी मुद्दों को लेकर सांसद संघर्ष करेगा वे बुलेटिन में पहले लेख में रखे गए हैं। इस लेख में हम उन मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे कि बवाना के मज़दूरों के स्थानीय सवाल क्या हैं और उन सवालों पर सांसद क्या कर सकता है?
पहली बात, इस पार्टी को बनाने में वे कार्यकर्ता और मज़दूर शामिल हैं जिन्होने पिछले साल 19 जनवरी को आग लगने पर केजरीवाल सरकार का घेराव किया था और सुरक्षा के इंतजामों को लागू करवाने के लिए 25 मार्च को हड़ताल की थी। इस साल भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के समर्थन से बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन ने 3 मार्च को श्रम कानूनों को लागू करवाने हेतु हड़ताल की थी। ज़रा सोचिए! अगर भारत की क्रांतिकारी मज़दूर पार्टी का सांसद जीतता है तो क्या-क्या हो सकता है! फैक्टरी इलाके में श्रम कानून लागू करवाने का संघर्ष खुद सांसद करेगा और यह सुनिश्चित करवाने हेतू लड़ेगा कि फैक्टरियों में श्रम कानून लागू हों! ज़रा सोचिए! अगर मज़दूरों के संघर्ष में मज़दूर पार्टी का सांसद उनके नेता के तौर पर खड़ा हो तो हम उन सभी हक़ों को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे जिनका मालिक और प्रशासन कि मिलीभगत के कारण मिल पाना असंभव हो जाता है। ज़रा सोचिए! जिन भी मुद्दों पर मज़दूर और मालिक के बीच टकराव होगा यानी वेतन न मिलने से लेकर, काम से निकालने से लेकर श्रम कानून न लागू होने सरीखी सभी मांगें, उन पर आपका अपना मज़दूर-वर्गीय सांसद आपके साथ खड़ा होगा।
मज़दूर पार्टी (RWPI) का सांसद बवाना औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों और मेहनतकशों के लिए क्या करेगा?
एक सांसद स्थानीय कामों के लिए साल में 5 करोड़ रुपये खर्च कर सकता है। इस फंड से हमारी बवाना की मज़दूर रिहायश में पीने के पानी कि सुविधा, स्कूल, पार्क, खेलकूद के इंतजाम, अस्पताल की बिल्डिंग सरीखे तमाम काम करवाए जा सकते हैं। इसके अलावा तमाम सरकारी नीतियों को जनता तक पहुँचने में सांसद भूमिका निभा सकता है। हमारा मज़दूर सांसद निम्न कार्य तो तत्काल शुरू करवा सकता हैः
- इस फंड से भारत की क्रांतिकारी मज़दूर पार्टी का सांसद चुने जाने पर इलाके में पुस्तकालय खुलवाएगा, बच्चों के लिए शिक्षण-मनोरंजन क्लब खुलवाएगा।
- राशन की पर्याप्त दुकानें खुलवाएगा जहां सस्ता राशन मिलता हो।
- इलाके में तत्काल डिस्पेन्सरी खुलवाएगा जहां डॉक्टर हर दिन बैठेगा व आगे चलकर आबादी के घनत्व के अनुसार अस्पताल खुलवाया जाएगा।
- इलाके में मज़दूरों के रहने के लिए सुविधासम्पन्न और विशाल मज़दूर हॉस्टल बनवाए जाएंगे जहां वे मज़दूर रह सकें जिनके पास रहने की सुविधा नहीं है।
- इन हॉस्टलों में सामुदायिक कैंटीन की सुविधा भी होगी जिसमें सस्ती दरों पर खाना मिलेगा।
- इलाके की उजड़ी हुई सड़कें जन-निगरानी में बनवाई जाएंगी।
- एम्बुलेंस और शव उठाने वाली गाड़ी की निशुल्क सेवा का इंतजाम किया जाएगा।
- पीने के साफ पानी का इंतजाम किया जाएगा जिसके लिए पूरे इलाके में पानी की लाइनें बिछवाई जाएगी।
- पूरे इलाके में नालियों व जमा पानी को सापफ़ करवाया जाएगा वा गटर की सफ़ाई ठीक प्रकार से होगी।
- स्कूलों के लिए कम्प्यूटर खरीदे जाएँगे जहां ओपन सॉफ्टवेअर ट्रेनिंग दी जाये। साथ ही युवाओं की ट्रेनिंग के लिए तकनीकी ट्रेनिंग केंद्र खोले जाएँगे।
- 11. खेल के सुविधासम्पन्न स्टेडियम व मोहल्लों में स्पोर्ट्स क्लब खोले जाएँगे।
- पूरे इलाके के लिए एक मोबाइल लाइब्रेरी की व्यवस्था की जाएगी।
- फैक्टरी इलाके में और रिहायशी इलाके में पर्याप्त संख्या में क्रैच (पालना घर) की सुविधा दी जाएगी, ताकि सभी महिला मज़दूरों के लिए सुविधा हो सके।
- इलाके में जन सुनवाई केंद्र खोले जाएँगे जहां किसी भी समस्या को लेकर मज़दूर आबादी अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है।
- बवाना को मुख्य शहर व उसके केन्द्रों से जोड़ने के लिए जन परिवहन की पूरी व्यवस्था की जायेगी, यानी पर्याप्त संख्या में बसें चलवाई जाएंगी।
- तमाम सरकारी विभागों के दफ्तर बवाना के रिहायशी क्षेत्र में ही खोले जाएंगे ताकि मज़दूरों को अपने छोटे-मोटे काम करवाने के लिए कई किलोमीटर दूर शहर के मुख्य केन्द्रों तक न जाना पड़े।
- श्रम विभाग का एक कार्यालय बवाना में भी खुलवाया जायेगा।
ये वे कार्य हैं जिन्हें अगर एक मज़दूर वर्ग का प्रतिनिधि संसद में पहुंचे तो अपने लोकसभा क्षेत्र में करवा सकता है। इसके साथ ही अन्य मुद्दों को चिन्हित करने के लिए भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के सदस्य और वॉलंटियर इलाके में जांच-पड़ताल बैठक कर रहे हैं। बवाना के मज़दूरों को अपनी मज़दूर पार्टी का वॉलंटियर बनाना होगा और अपनी गली और मोहल्ले से लेकर हर स्तर पर इस लोकसभा चुनाव में पूंजीपतियों की इस या उस चुनावबाज पार्टी को चुनने की जगह मज़दूरों मेहनतकशों का स्वतंत्र पक्ष खड़ा करने में अपनी भागीदारी अदा करनी होगी। नहीं तो कल हमें अपनी किसी भी समस्या के बारे में शिकायत करने का कोई हक़ नहीं होगा।
