यह चुनाव आयोग है या भाजपा का चुनाव विभाग?

यह चुनाव आयोग है या भाजपा का चुनाव विभाग?

भारत के इतिहास में कभी भी चुनाव आयोग की ऐसी गयी-बीती हालत नहीं रही है। यह स्वाभाविक भी है। फ़ासीवाद की ख़ासियतों में से एक यह भी है कि यह पूँजीवादी जनवाद की तमाम “सम्मानित संस्थाओं” को अन्दर से खोखला बना देता है। पहले भी भारत में इन संस्थाओं की हालत ख़राब ही थी। लेकिन इज़्ज़त बचाने के लिए ये संस्थाएँ कुछ कदम उठाया करती थीं। लेकिन अब आप चाहे चुनाव आयोग पर निगाह डालें या फिर न्यायपालिका पर, ये मानो आज की फासीवादी शासक पार्टी भाजपा और नरेन्द्र मोदी के इशारों पर काम कर रहे हैं।

भाजपा के नेता खुले तौर पर चुनावी रैलियों में भारतीय सेना को ‘मोदी की सेना’ बता रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग ‘चेतावनी’ भर देकर रह जा रहा है। प्रधानमन्त्री एक सैटेलाइट को नष्ट करने वाली मिसाइल के परीक्षण के एलान के बूते चुनाव प्रचार कर रहा है, लेकिन उसमें चुनाव आयोग को कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिख रहा है। बालाकोट हमले के बारे में झूठी बातें बोलकर उसका चुनाव प्रचार में इस्तेमाल खुले तौर पर हो रहा है, लेकिन चुनाव आयोग अन्धा बना हुआ है! ‘नमो टीवी’ नामक एक चैनल मोदी के महिमामण्डन के लिए अचानक रहस्यमय तरीके से प्रकट होता है, लेकिन चुनाव आयोग उस पर कोई कदम नहीं उठाता, वह भी तब जब कि इस चैनल के लिए कोई पंजीकरण या आज्ञा नहीं ली गयी थी! सारे कानूनों और नियमों को ताक पर रखकर हार की डर में परेशान भाजपा और संघ परिवार चुनाव की आचार संहिता की खुलेआम धज्जियाँ उड़ा रही है, लेकिन चुनाव आयोग शान्त है। ऐसे में, इस संस्था की तथाकथित निष्पक्षता की सच्चाई जनता के सामने आ गयी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि सभी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के साथ वीवीपैट की व्यवस्था करके चुनावों में पारदर्शिता को सुनिश्चित क्यों नहीं किया जा सकता है? तो इस पर जवाब देने की बजाय चुनाव आयोग सर्वोच्च न्यायालय से पूछता है कि क्या उसे ईवीएम पर भरोसा नहीं है! यह कैसा जवाब है? चुनाव आयोग सभी ईवीएम मशीनों के साथ चुनावों में वीवीपैट की व्यवस्था करने से क्यों घबरा रहा है? क्या इसके पीछे कोई साजि़श तो नहीं? इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। जब हालिया विधानसभा चुनावों में ही ईवीएम मशीनें सड़क पर पड़ी मिल रही थीं, भाजपा नेताओं के घर से बरामद हो रही थीं, जहां ईवीएम मशीनें रखी गयीं थीं, वहां अचानक लाइट चली जा रही थी और सीसीटीवी कैमरा बन्द हो जा रहे थे, तो क्या यह शक़ लाजि़मी नहीं है कि भाजपा सरकार ईवीएम घोटाला करने पर आमादा है?

लेकिन इन सभी चिन्ताओं के विषय में चुनाव आयोग को कुछ नहीं कहना है! ऐसे में, यह शक़ लाजि़मी है कि चुनाव आयोग भाजपा के चुनाव विभाग के तौर पर काम कर रहा है। ज़ाहिर है, फासीवाद ने पूंजीवादी चुनावों की पूरी प्रक्रिया को ही बिगाड़कर रख दिया है।

आम मेहनतकश जनता को इन बारे में चौकस रहना चाहिए। चुनाव का पूँजीवादी जनवादी हक़ हमारे लिए ज़रूरी है। हम अपने मज़दूर वर्गीय राजनीतिक संघर्ष को पूँजीवादी जनवाद के रहते हुए तेज़ी से आगे बढ़ा सकते हैं और चुनने और चुने जाने का अधिकार (हालाँकि मज़दूर वर्ग के लिए ‘चुने जाने के अधिकार’ में इतनी बाधाएँ खड़ी कर दी जाती हैं, कि वह आम तौर पर चुनाव में इस अधिकार का उपयोग ही नहीं कर पाता है) पूँजीवादी जनवाद का सबसे बुनियादी अधिकार है। इस अधिकार को पूर्ण बनाने के लिए भी संघर्ष किया जाना चाहिए और इसे बचाने के लिए भी। इसलिए अगर चोर दरवाज़े से इस अधिकार को फासीवादी मोदी सरकार नष्ट करने का प्रयास करती है, तो हमें ज़रूरत पड़ने पर सड़कों पर उतर कर इसके लिए संघर्ष करने के लिए तैयार रहना चाहिए।