सेना को “मोदी सेना” कहना आम सैनिकों का अपमान
भाजपा-मोदी के अंधराष्ट्रवाद को बेनकाब करो!
सेना को “मोदी सेना” कहना आम सैनिकों का अपमान
लोकसभा चुनाव प्रचार में भाजपा-मोदी चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाते हुए सैन्य कार्रवाई और सेना के नाम पर वोटबटोरने में लगे हुए हैं। यूपी के मुख्यमंत्री योगी से लेकर केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी चुनावी रैलियों में भारतीय सेना को ‘मोदी की सेना’ बता रहे है। ऐसे में सैन्य परिवार व मेहनतकश आबादी को सोचने की ज़रूरत है। अपने आपको “राष्ट्रभक्त” और “देशभक्त” का तमगा खुद ही देकर इतराने वाली नरेन्द्र मोदी सरकार सैनिकों की मौत पर तो घडि़याली आँसू बहाती है लेकिन जब उन्हीं सैनिकों ने हवाई यात्र की माँग की थी तो मोदी सरकार ने इसे ठुकरा दिया था। जब यह हमला हुआ उस समय मोदी उत्तरखण्ड के कॉर्बेट पार्क में एक फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे और हमले की सूचना मिलने के बाद भी उन्होंने शूटिंग जारी रखी थी।
मृत सैनिकों के परिवारजन अभी भी ये सवाल उठा रहे हैं कि आखि़र यह हमला सम्भव ही कैसे हुआ? सैनिकों को सीआरपीएफ की माँग के बावजूद एयरलिफ्ट क्यों नहीं कराया गया? आरक्षित रास्ते में विस्फोटकों से लदी कार कैसे पहुँची? वहीं आज सैनिकों की एयरलिफ्ट की माँग ठुकराने वाली भाजपा आज चुनावी प्रचार के लिए 200 से ज़्यादा हेलीकॉप्टर और चार्टर्ड प्लेन बुक कर चुकी है जिसका एक दिन का ख़र्च 10-15 लाख रुपये है। ज़रा सोचिये, मोदी सरकार को सैनिकों की इतनी ही 0फ़िक्र है तो वह पिछले चार वर्षों से ‘वन रैंक वन पेंशन’ की माँग को स्वीकार करके लागू क्यों नहीं करती? वर्षों से बेहतर खाने और जीवन-स्थितियों की माँग करने वाले सैनिकों को मोदी सरकार बर्खास्त क्यों कर रही है? जीवित रहते सैनिकों की जायज़ माँगों की कोई सुनवाई नहीं है लेकिन जैसे ही वह एक ताबूत में आता है, वैसे ही उस पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के प्रयास शुरू हो जाते हैं।
आज मोदी सरकार पाँच साल की अपनी नाकामी को छिपाने, पूँजीपतियों के तलवे चाटने की अपनी हरकतों के बेनकाब होने और भ्रष्टाचार के दलदल में धँसे होने के कारण अब चुनावों के ठीक पहले युद्धोन्माद भड़का रही है। पिछले कई चुनावों की ही तरह इस चुनाव के पहले भी एक आतंकी हमला हो गया है! 1999 के लोकसभा चुनावों के पहले कारगिल युद्ध हुआ, 2001 में सात राज्यों के विधानसभा चुनावों के पहले संसद पर आतंकी हमला हुआ, उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों के पहले उरी हमला हुआ और अब सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव के पहले पुलवामा हमला हो गया! जब भी भाजपा सरकार होती है, तो चुनावों से ठीक पहले आतंकवादी हमला क्यों हो जाता है?
मोदी राज में सैनिकों के हालात बताने वाली गृह मंत्रालय की रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि वर्ष 2014 से 2017 तक बीमारी के चलते 3221 जवान और अधिकारियों की मौत हो चुकी है। मोर्चे पर बीमारी के चलते मरने वाले जवानों में सबसे बड़ी संख्या सीआरपीएफ के जवानों की है। अलग-अलग मोर्चों पर 1489 जवान अभी तक दम तोड़ चुके हैं। वहीं 2018 में सेनाओं और अर्द्धसैनिक बलों के 104 जवानों ने आत्महत्या की, 2017 में 101 जवानों ने और 2016 में 129 जवानों ने आत्महत्या की थी। इनमें से ज़्यादातर मजदूरों, किसानों या कुछ मध्यवर्गीय घरों के युवा ही हैं। स्पष्ट है कि सैनिकों की इन मौतों के लिए जि़म्मेदार ताक़तें जब देशभक्ति और “राष्ट्रभक्ति” की बात करती हैं, तो उनके देश और “राष्ट्र” में आम मज़दूर, ग़रीब किसान और मेहनतकश नहीं होते! सच यह है कि उनके “राष्ट्र” में हम मेहनतकश कहीं नहीं हैं। हमारा काम सिर्फ यह है कि हम अम्बानियों-अडानियों के लिए मरते-खपते रहें, चाहे कारखानों, खलिहानों में या फिर सरहद पर।
भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी का घोषणापत्र स्पष्ट करता है कि आज सैनिकों का सच्चे मायने में समर्थन करने का अर्थ है कि हम उनकी जायज़ माँगों का समर्थन करें, सेना में उनकी जीवन व कार्य स्थितियों को बेहतर बनाने की उनकी माँगों का समर्थन करें और ‘वन रैंक वन पेंशन’ की माँग का समर्थन करें। RWPI का सैनिकों व पुलिस बलों हेतु निम्न एजेण्डा है
- पुलिस और सेना को शान्ति काल में उत्पादक कार्रवाइयों में लगाया जाना चाहिए और उन्हें सभी जनवादी अधिकार जैसे कि राजनीतिक साहित्य का अध्ययन करना, यूनियन बनाना, हड़ताल करना, आदि दिये जाने चाहिए। सेना और पुलिस में अर्दलियों की व्यवस्था तत्काल समाप्त की जानी चाहिए। सेना के भीतर अधिकारियों का सैनिकों द्वारा चुनाव होना चाहिए। एक चुने हुए सैन्य अधिकारी की ही सच्ची मान्यता और प्राधिकार हो सकता है।
- हथियारों की ख़रीद और सेना के अधिकारियों के विशेषाधिकारों पर होने वाले भारी-भरकम ख़र्च में कटौती की जाये।
- वन रैंक वन पेंशन की सैनिकों की माँग को तत्काल स्वीकार किया जाये।
- सैन्य बलों, अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस बल में रैंक के अनुसार खान-पान व रहन-सहन में विभेद की व्यवस्था को समाप्त किया जाये।
