भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी लड़ेगी आँगनवाड़ी महिलाकर्मियों को कर्मचारी का दर्जा दिलवाने का संघर्ष
भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी लड़ेगी आँगनवाड़ी महिलाकर्मियों को कर्मचारी का दर्जा दिलवाने का संघर्ष
देश भर में महिला एवं बाल विकास मंत्रलय के तहत चलने वाली समेकित बाल विकास परियोजना में ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली लगभग 28 लाख महिलाकर्मी हैं। कुल मिलकार देखा जाये तो स्कीम वर्कर्स (आँगनवाड़ी, आशा व मिड-डे-मील वर्कर्स) की संख्या 1 करोड़ के करीब है। आँगनवाड़ी जैसी महत्वपूर्ण योजना को ‘स्कीम’ के दर्जे़ के तहत चला कर वाहवाही बटोरने वाली सरकारें इसकी ज़रूरत और इसकी कार्यप्रणाली पर कितना ध्यान देती हैं वह इसी तथ्य से साफ़ हो जाता है कि भारत में दुनिया भर के कुपोषित बच्चों की एक-तिहाई आबादी है। 2018 में आई रिपोर्ट के अनुसार विश्व भूख सूचकांक में 119 देशों की सूची में 103वें स्थान पर है। वहीं देश भर के आँगनवाडि़यों के हालातों पर अगर एक निगाह दौड़ाई जाये तो खुद सरकारी आंकड़ें ही इनकी स्थिति बयान कर देते हैं। 2016 की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार देश की 13.7 फ़ीसदी आँगनवादी केन्द्रों में पीने के साफ पानी का कोई इन्तज़ाम नहीं है। वहीं स्वच्छता की कसौटी पर सिर्फ 48.2 प्रतिशत केन्द्र मान्य पाये गए। 2019-20 के वित्तीय वर्ष के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग को 29,165 करोड़ रुपये की राशि आबण्टित की गयी है। लेकिन पिछले कई सालों की प्रवृत्ति देखें तो जितनी राशि आबण्टित की जाती है, असल में उतनी राशि कभी ख़र्च नहीं की जाती। तथ्य झूठ के बड़े-बड़े तिलिस्मों को भेद डालते हैं! मसलन, व्यय वित्त समिति (एक्स्पेण्डिचर फाइनैन्स कमिटी) ने 12वीं पंचवर्षीय योजना 2012-17 में आँगनवाड़ी परियोजनाओं के लिए 1,23,580 करोड़ रुपये की राशि को स्वीकृति दी थी, लेकिन 2012-17 के बीच ख़र्च की गयी राशि 78,768 करोड़ रुपये ही थी, जो स्वीकृत राशि का 64 प्रतिशत थी। 2016-17 के वित्तीय वर्ष की ही बात करें तो स्वीकृत राशि 30,025 करोड़ रुपये थी और ख़र्च की गयी राशि 14,561 करोड़, यानी स्वीकृत राशि का मात्र 48 प्रतिशत ही ख़र्च हुआ! बजट बनाते समय सरकारों के द्वारा अपने ख़ूब गाल बजाए जाते हैं किन्तु आबण्टित राशि बहुत बार तो ख़र्च ही नहीं होती और यदि कुछ ख़र्च होती भी है तो बिना किसी पारदर्शिता के। कहना नहीं होगा कि बहुत सा पैसा एनजीओ-नेताशाही-नौकरशाही की ही भेंट चढ़ जाता है!
इस परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण पद पर काम करने वाली आँगनवाड़ी कार्यकर्ता व सहायिका योजना में कार्यरत ‘वालण्टियर’ के रूप में काम करती हैं। देश में तकरीबन 28 लाख आँगनवाड़ी महिलकर्मी कार्यरत हैं। आँगनवाड़ी महिलकर्मी एक ऐसी फ़ौज है जिसकी हर शहर, हर गाँव, हर इलाके में पहुँच है। सभी चुनावबाज़ पूँजीवादी पार्टियों ने इस ताकत का इस्तेमाल अपने हितों की लिये किया है। अपनी रैलियों की भीड़ बढ़ाने से लेकर वोट बैंक के रूप में उनका इस्तेमाल किया गया है। जुमलेबाज़ मोदी सरकार ने भी इसे ध्यान में रखते हुये स्कीम वर्करों के मानदेय में 50 फ़ीसदी बढ़ोत्तरी का जुमला पिछले साल के सितम्बर माह में ही उछाला था। 5 महीने में इस बढ़ोत्तरी की एक फूटी कौड़ी भी किसी आँगनवाड़ी महिलकर्मी के बैंक खाते में नहीं पहुँची। वैसे भी आँगनवाड़ी महिलकर्मी की असल माँग मानदेय बढ़ोत्तरी से ज़्यादा, कर्मचारी के दर्जे की है। 1975 से चल रही यह ज़रूरी योजना के तहत ज़मीनी तौर पर काम कर रही आँगनवाड़ी महिलकर्मियों को न न्यूनतम मज़दूरी मिलती है न ही ये किसी श्रम कानूनों के अंतर्गत आती हैं।
भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) स्कीम वर्करों (आँगनवाड़ी, आशा व मिड-डे-मील कर्मचारी) के पक्का किए जाने की माँग, उन्हें कर्मचारी का दर्जा दिये जाने की माँग का समर्थन करती है। यदि RWPI का प्रत्याशी जीत कर संसद में जाता है तो स्कीम वर्करों की इस माँग को व्यक्तिगत बिल के जरिये संसद में उठाने की घोषणा करता है। स्कीम वर्करों के लिये जुमले फेंकने वाली तमाम चुनावबाज़ पार्टियों ने आज तक कभी संसद में ऐसा सवाल उठाया तक नहीं है। ज़ाहिर है, इस मसले पर यदि यह पार्टियाँ स्कीम वर्करों को कर्मचारी का दर्जा दिये जाने के बिल के समर्थन में नहीं आती हैं तो मेहनतकश जनता के सामने खुद को ही नंगा करने का काम करेंगी। वैसे भी जिस देश में हर 5 में से एक नागरिक ग़रीब की श्रेणी में आता हो, वहाँ आने वाली पीढ़ी को पोषणयुक्त आहार दिये जाने का काम किसी ‘स्कीम’ के तहत क्यों है? RWPI का मानना है की इस स्कीम को बाकायदा नीति के रूप में चलाया जाना चाहिए न की किसी विशेष योजना के रूप में। जिस देश में बच्चे ‘भात-भात’ की रट लगाते दम तोड़ देते हैं और देश की राजधाानी में तीन बच्चियाँ भुखमरी की कगार पर दम तोड़ देती हैं, वहाँ समेकित बाल विकास परियोजना को विशेष स्कीम के तहत चलाया जाना एक भद्दा मज़ाक है! ऐसे में आँगनवाड़ी महिलाकर्मियों को तय करना है कि वो अपनी संख्या की ताक़त का इस्तेमाल टाटा-बिड़ला-अम्बानी- अडानी के टुकड़ों पर पलने वाली पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियों का मोहरा बनने के लिये करेंगी या मेहनतकश का स्वतन्त्र पक्ष खड़ा करने के लिये भारत की क्रान्तिकारी मजदूर पार्टी का समर्थन करेंगी। RWPI का उम्मीदवार सांसद के तौर पर जीतने पर निम्न कार्रवाइयां तत्काल करेगाः
- आंगनवाड़ी सेण्टरों पर आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा अन्यायपूर्ण इंस्पेक्शन व महिलाकर्मियों का उत्पीड़न तत्काल बन्द करवाया जायेगा।
- आंगनवाड़ीकर्मियों का मानदेय दिल्ली की न्यूनतम मज़दूरी के अनुसार आंगनवाड़ी वर्करों के लिए कुशल मज़दूरों जितनी यानी रुपये 16,962 प्रति माह और हेल्परों की अकुशल मज़दूरों जितनी यानी रुपये 14,000 प्रति माह करने के लिए तत्काल संघर्ष किया जायेगा।
- विभाग द्वारा बिना किसी सुनवाई के निलम्बन या निष्कासन पर पूर्ण रोक लगायी जायेगी।
- सरकार द्वारा जारी की गयी खाने की गुणवत्ता-सम्बन्धी घोषणा को तत्काल लागू करवाया जायेगा। सभी एनजीओ को मिले टेण्डरों को सार्वजनिक ऑडिट कराया जायेगा।
- पैनल या लीव पर काम कर रहीं सभी बहनों को तुरन्त नियमित किया जायेगा।
- प्रमोशन-सम्बन्धी नियमों को आंगनवाड़ी कर्मियों के लिए अनुकूल बनाया जायेगा।
- आंगनवाडि़यों के अतिरिक्त चार्ज की व्यवस्था को तत्काल ख़त्म कर दिया जायेगा। खाली पड़े पदों को तत्काल भरा जायेगा।
