भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) और क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में मनरेगा मजदूरों ने काम के अधिकार और भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ आवाज़ उठायी

भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) और क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में मनरेगा मजदूरों ने काम के अधिकार और भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ आवाज़ उठायी

1 अप्रैल, 2019। कलायत (हरियाणा)।  क्रान्तिकारी मनरेगा मजदूर यूनियन और भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) के बैनर तले गाँव चौशाला के मनरेगा मज़दूरों ने कलायत में बीडीओ कार्यालय पर प्रदर्शन किया। यूनियन के प्रवीन ने बताया कि पिछले कई सालों से मनरेगा योजना के तहत काम करने वाले मज़दूरों को किसी भी प्रकार का कोई काम नहीं दिया जा रहा। गाँव में कम से कम 206 मज़दूरों का मनरेगा के तहत जॉब कार्ड भी बना हुआ है जिसको बैंक खाते से भी जोड़ रखा है। यह सब कुछ होने के बाद भी मज़दूरों को काम नहीं दिया जा रहा। दूसरी तरफ मनरेगा कानून कहता है कि अगर मनरेगा के तहत किसी मज़दूर को 15 दिन तक कोई काम नहीं मिलता तो वह बेरोज़गारी भत्ते का हक़दार हो जाता है लेकिन मज़दूरों का कहना है कि उनको ऐसे कानून की कोई जानकारी नहीं है। अब ऐसे हालात में वे काम न मिलने की सूरत में कहाँ जाए? कांग्रेस की सरकार में जिस मनरेगा कानून को लागू किया था उसके तहत ग्रामीण मज़दूरों को एक साल में कम से कम 100 दिन का काम दिया जाना चाहिए और कुछ ख़ास परिस्थितियों में यह 150 दिन का भी हो सकता है। लेकिन मज़दूरों का कहना है कि 100-150 दिन काम मिलना तो दूर की बात पिछले लम्बे समय से उनको एक दिन भी काम नहीं मिला है। वैसे तो जब से यह कानून बना है तब से ही वह कागज़ों तक ज़्यादा सीमित है। सत्ता में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की दोनो के समय ही मनरेगा योजना अधिकांश जगहों पर ज़मीनी धरातल पर सही से लागू नहीं हो पाई। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि जितनी बार भी मनरेगा का बजट पास किया गया है उतनी ही बार हज़ारों करोड़ रुपये मनरेगा के तहत ख़र्च करने की बजाय उसके बड़े हिस्से को बकाया के तौर पर अगले बजट में डाल दिया गया है। जो थोड़ा-बहुत बजट मनरेगा के तहत कागज़ों में लगाया हुआ दिखाया जाता है उसके बड़े हिस्से को भी हर बार ऊपर से नीचे तक व्याप्त भ्रष्टाचार के तहत पूरा प्रशासन हजम कर जाता है। अंत में देखा जाए तो इतना सब होने के बाद मज़दूरों को कुछ भी हासिल नहीं होता सिवाय भुखमरी, ग़रीबी, बेरोज़गारी के।

RWPI कुरूक्षेत्र लोकसभा उम्मीदवार साथी रमेश खटकड़ ने कहा कि आज हरियाणा ही नहीं बल्कि पूरे देश में जहाँ-जहाँ मनरेगा का काम चलता है वहाँ सभी जगह ऊपर से नीचे तक प्रशासन के भ्रष्टाचार के केस हर दिन उजागर हो रहे हैं। वैसे तो भाजपा की खट्टर सरकार अपने आप को “भ्रष्टाचार मुक्त” सरकार बताती है लेकिन जो भ्रष्टाचार मनरेगा में कांग्रेस की सरकार के समय से चला आ रहा था वह आज भी भाजपा सरकार में ज्यों का त्यों बना हुआ है, बल्कि पहले से भी बढ़ गया है। सत्ता में आने से पहले भाजपा सरकार ने मज़दूरों से बड़े-बड़े वायदे किए थे जिनमे “अच्छे दिनों” का वायदा भी शामिल था लेकिन जैसे ही भाजपा की मोदी सरकार सत्ता में आयी वैसे ही अपने सभी वायदों से मुखर गयी।  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मीडिया के सामने इन सभी वायदों को जुमला करार दे देते हैं। NSSO का आँकड़ा बताता है कि पिछले एक साल के दौरान एक करोड़ दस लाख लोगों के रोज़गार छिन चुके हैं। जिस मोदी सरकार ने हर साल दो करोड़ नौकरियाँ देने का वायदा किया था उसने नौकरियाँ देना तो दूर पाँच साल में पौने चार करोड़ लोगों का रोजगार छीन लिया है। इस दौरान जिन लोगों का रोज़गार छिना है उनमें सबसे ज़्यादा मज़दूर आबादी शामिल है। आँकड़े बताते हैं की पिछले पाँच सालों में मोदी सरकार ने देश की मेहनतकश जनता को रोज़गार देने की बजाय जाति-धर्म के नाम पर सिर्फ दंगे-फ़साद और मार-काट कराई है। आज जिन हालात से देश गुज़र रहा है उसमें जाति-धर्म की लड़ाई को छोड़ कर मेहनतकश जनता को एकजुट होने की ज़रूरत है। किसी भी पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टी के भरोसे न रह कर, मेहनतकश लोगों को चुनाव में भी अपना विकल्प खड़ा करने की जरूरत है। भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी जिसे स्वयं मज़दूरों-मेहनतकशों और उनके राजनीतिक संगठनकर्ताओं ने बनाया है और जो उन्हीं के संसाधनों पर चलती है, ऐसी ही एक पार्टी है और मनरेगा मज़दूरों ने अपने प्रदर्शन के दौरान उसे समर्थन और वोट देने की घोषणा की। अंत में मज़दूरों का कहना था की अगर उनको जल्द से जल्द मनरेगा के तहत काम नहीं मिला तो वह अपने आन्दोलन को अपने गाँव के साथ-साथ आस-पास के दूसरे गाँव में भी फैला कर ओर तेज़ करेंगे। RWPI ने इस आन्दोलन को पूर्ण समर्थन दिया और कुरुक्षेत्र से जीतने की सूरत में मनरेगा मज़दूरों की माँगों को पूरा करवाने का वायदा किया।