क्या मोदी मज़बूत नेता है?
क्या मोदी मज़बूत नेता है?
पूरे देश में चुनावों के पहले भाजपा के पास कहने के लिए कुछ नहीं है। न तो रोज़गार के बारे में वह कुछ बोल रही है, न काले धन के बारे में, न किसानों की कर्ज़ माफ़ी के बारे में और न ही “अच्छे दिन” के बारे में! वह एक ही राग अलाप रही हैः मोदी नहीं तो कौन? मोदी ही ताक़तवर नेता है! मोदी ही मज़बूत नेता है! सर्जिकल स्ट्राइक और अन्धराष्ट्रवाद के नाम पर वोट बटोरने की कोशिश हो रही है, हालाँकि अन्तरराष्ट्रीय मंच पर भारत का मित्र अमेरिका स्वयं बोल रहा है कि बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक में न तो आतंकवादी मारे गये हैं और न ही पाकिस्तान का कोई एफ़-16 जहाज़ गिराया गया है। लेकिन मोदी-शाह के टुकड़ों पर पलने वाला कारपोरेट मीडिया चीख़-चीख़कर मोदी को “ताकतवर” नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। क्या ऐसा है? आइये देखते हैं।
- मोदी सरकार के कार्यकाल में आतंकवादी हमलों में 94 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। भारत के इतने सैनिक किसी अन्य शासन में नहीं मरे जितने कि अकेले मोदी राज में मरे हैं। क्या यह “मज़बूत” नेता की निशानी है?
- पुलवामा हमले में मारे गये सैनिकों ने हवाई मार्ग से ले जाये जाने की माँग की थी। लेकिन अपने चुनाव प्रचार में रोज़ 40 हेलीकॉप्टर इस्तेमाल करने वाले मोदी और उसकी सरकार ने सैनिकों की प्रार्थना ठुकरा दी, जिसके कारण 44 सैनिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा? क्या यह “ताक़तवर” नेता की निशानी है?
- दमित राष्ट्रीयताओं के अलगाव को मोदी सरकार ने किसी भी अन्य सरकार से ज़्यादा बढ़ावा दिया है, जिसके कारण कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक दमित राष्ट्रीयताएँ अपने आपको अलग-थलग महसूस कर रही हैं। हमेशा ही सैन्य दमन के कारण वे अलगाव का शिकार थीं, लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में यह अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। क्या यह “फैसला लेने वाले नेता” की पहचान है?
- असम में नागरिकता संशोधन बिल लाकर जनता को आपस में लड़ा देने की साजि़श भी मोदी सरकार ने ही की है। क्या यह देश की जनता की एकजुटता को कायम रखना है? क्या यह “शक्तिशाली” नेता की निशानी है?
- देश में पिछले पाँच वर्षों में मोदी सरकार ने पौने चार करोड़ लोगों के रोज़गार छीन लिये। जीएसटी और नोटबन्दी ने पहले से मन्दी की मार झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया और ऊपर से मोदी सरकार फ़र्जी आँकड़े और झूठ बोलकर 7 प्रतिशत की वृद्धि दर का खोखला दावा कर रही है। क्या यह “मज़बूत नेता” की निशानी है?
- देश में खेती का संकट अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। ग़रीब किसानों की भारी संख्या ज़मीनों को बेचकर मज़दूरों की कतार में शामिल हो गयी। कर्ज़ माफ़ी की 2014 की मोदी की घोषणा एक जुमला साबित हुई। क्या ये सब तथ्य किसी “निर्णायक नेता” की ओर इशारा करते हैं?
- भारतीय बैंकिंग व्यवस्था को मोदी सरकार ने तबाह कर दिया है। बैंकों की हालत दयनीय हो रखने के लिए रिज़र्व बैंक के आरक्षित धन को भी ख़र्च कर रही है। देश एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट की कगार पर आ खड़ा हुआ है। क्या यह किसी “मज़बूत नेता” की निशानी है?
- देश से दर्ज़नों घोटालेबाज़ उद्योगपति व व्यवसायी जैसे कि ललित मोदी, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या भाग चुके हैं और मोदी सरकार उन्हें न सिर्फ वापस न ला सकी, बल्कि ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं कि इन भगोड़ों को स्वयं मोदी सरकार ने ही भगाने में मदद की है। क्या यह किसी “ईमानदार” नेता की निशानी है?
- राफ़ेल घोटाले में मोदी सरकार पूरी तरह नंगी हो गयी और यह सामने आ गया कि मोदी सरकार रिलायंस जैसे उद्योगपतियों के सामने कैसे नतमस्तक है। देश के छह एयरपोर्ट अडानी को सौंप दिये गये, लाल किला तक उसे बेच दिया गया! क्या यह किसी “मज़बूत नेता” की निशानी है?
ज़रा सोचिये दोस्तो! मोदी सरकार के झूठे प्रचार में मत फँसिये। यह “मज़बूत सरकार” नहीं बल्कि पूँजीपतियों के सामने नतमस्तक और बिकी हुई सरकार है। इसे सत्ता से हटाए बिना मज़दूर वर्ग की बरबादी होगी। फासीवादी भाजपा को हराना, मज़दूर वर्ग का सबसे अहम तात्कालिक लक्ष्य है। यह भी तभी सम्भव है जबकि मज़दूरों-मेहनतकशों की स्वतन्त्र आवाज़ संसद तक पहुँचे। RWPI इसी मक़सद के साथ चुनावों में हस्तक्षेप कर रही है और हमें इसे जिताना होगा।
