मेहनतकश जनता अपना स्वतन्त्र विकल्प खड़ा करके ही फासीवादी मोदी सरकार को हरा सकती है!
मेहनतकश जनता अपना स्वतन्त्र विकल्प खड़ा करके ही फासीवादी मोदी सरकार को हरा सकती है!
मज़दूर पार्टी के उम्मीदवारों को विजयी बनाओ!
मज़दूर साथियो! मेहनतकश भाइयो और बहनो! कल पहले दौर का मतदान है। पूरे देश में मोदी सरकार के पाँच वर्षों में मज़दूरों-मेहनतकशों के जीवन में आयी तबाही के कारण मोदी सरकार के खि़लाफ़ ज़बर्दस्त असन्तोष है। भाजपा और संघ परिवार इस असन्तोष से डरकर ही साम्प्रदायिक प्रचार और अन्धराष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीट रहे हैं। लेकिन आप किसी भी कीमत पर साम्प्रदायिकता और अन्धराष्ट्रवाद के झाँसे में न फँसें। भाजपा और संघ परिवार के ‘राष्ट्र’ में आपका कोई स्थान नहीं है। राष्ट्रवाद की सोच वास्तव में अम्बानी-अडानी जैसे पूँजीपतियों की सेवा करती है। यही कारण है कि जब भी मज़दूर और मेहनतकश अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो भाजपा और संघ परिवार उनके आन्दोलन को “राष्ट्र-विरोधी” करार दे देते हैं। “राष्ट्र” क्या है? यह पूँजीपति वर्ग की कल्पना है जिसका इस्तेमाल वह हमें झाँसे में डालने, भटकाने और कुचलने के लिए करता है। हमारे लिए “राष्ट्र” शब्द का कोई अर्थ नहीं है, अगर उसका मतलब देश के 80 फीसदी मज़दूर, ग़रीब किसान और आम मेहनतकश नहीं हैं।
हम अपने देश से प्यार करते हैं। लेकिन देश काग़ज़ पर बना कोई नक्शा नहीं होता। देश उसमें रहने वाले लोगों से बनता है। इन लोगों में से 80 प्रतिशत लोग मज़दूर, ग़रीब किसान और आम मेहनतकश लोग हैं। यही लोग इस देश के लिए सुई से लेकर जहाज़ तक हर चीज़ बनाते हैं। क्या इस देश का भाजपा और साथ ही अन्य पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियों के घोषणापत्रों में कोई स्थान है? नहीं! अगर होता तो ये सभी पार्टियाँ क्या ठेका प्रथा को समाप्त करने का वायदा नहीं करतीं? अगर होता तो क्या अमीरज़ादों पर टैक्स बढ़ाकर क्या इन पार्टियों की सरकारें आम मेहनतकश जनता के लिए रोज़गार गारण्टी, सबके लिए समान और निशुल्क शिक्षा, सबके लिए समान और निशुल्क दवा-इलाज, सबके लिए आवास की गारण्टी की व्यवस्था नहीं करतीं?
भाजपा से ऐसी उम्मीद करना भी बेकार है कि वह हम मज़दूरों और मेहनतकशों की बात करेगी। जिस पार्टी को बड़े मालिकों और ठेकेदारों से 1035 करोड़ रुपये का चन्दा मिला हो, वह भला हमारी बात क्यों करने लगी? यही तो वजह है मोदी समेत भाजपा के सारे नेताओं की सभाओं में हमारे मुद्दे जैसे कि बेरोज़गारी, महँगाई, ठेका प्रथा का उन्मूलन, सभी श्रम कानूनों को लागू करना, जैसे मुद्दे ग़ायब हैं। नरेन्द्र मोदी ख़ुद “पाकिस्तान-पाकिस्तान”, “हिन्दू-मुसलमान”, वगैरह चिल्ला रहे हैं। हमें बेवकूफ़ बनाने के लिए “चौकीदार” का जुमला उछाला गया है। लेकिन अगर भाजपा सरकार के नेता-मन्त्री अगर वाकई चौकीदार हैं, तो उन्हें ठेका प्रथा पर 12-12 घण्टे खटने वाले चौकीदारों व सिक्योरिटी गार्डों जितनी तनख्वाह लेनी चाहिए, सारी सुविधाएँ छोड़नी चाहिए, अपनी सुरक्षा पर अरबों रुपये ख़र्च करने बन्द कर देने चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करते तो इसका अर्थ है कि ‘चौकीदार’ का जुमला आपको मूर्ख बनाने के लिए उछाला गया है।
कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में तमाम लोकलुभावन वायदे किये हैं जैसे कि 20 प्रतिशत सबसे ग़रीब परिवारों के व्यक्तियों को 6 हज़ार रुपये प्रति माह दिया जायेगा, शहरी रोज़गार गारण्टी योजना लायी जायेगी, मनरेगा में 100 की बजाय 150 दिनों का रोज़गार दिया जायेगा, किसानों की कर्ज़ माफ़ी की जायेगी, वगैरह। लेकिन क्या इन वायदों पर भरोसा किया जा सकता है? यह वही पार्टी है जिसने अपने 60 साल के राज में “ग़रीबी हटाओ” जैसे लोकलुभावन नारे देकर देश की सम्पदा को टाटा-बिड़ला जैसे पूँजीपतियों के हाथों बेचा है। यही वह पार्टी है जिसने निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों को 1991 में खुले तौर पर शुरू करके मज़दूरों की जि़न्दगी को तबाहो-बरबाद करने का काम किया था। भाजपा इन्हीं नीतियों को और भी ज़्यादा बेशर्मी और नंगई से आगे बढ़ा रही है। कांग्रेस ने जब भी ज़रूरत पड़ी है तो “सेक्युलरिज़्म” का मुखौटा लगाकर ‘सॉफ्ट केसरिया’ लाइन लागू की है। यही कारण है कि गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों का उत्पीड़न मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भी जारी है। सच तो यह है कि आम मेहनतकश और मज़दूर इस पार्टी पर कतई भरोसा नहीं कर सकते हैं।
भाजपा को छोड़कर सभी चुनावी पार्टियों के घोषणापत्र में किसानों के कर्ज़ माफ़ी की बात की गयी है। लेकिन पहली बात तो यह है कि ऐसे वायदे किसानों से पहले भी किये जा चुके हैं और बाद में सभी पार्टियों ने उन्हें धोखा ही दिया है। दूसरी बात यह है कि ऐसी कर्ज़ माफ़ी अगर होती भी है तो इसका फ़ायदा केवल धनी और ऊँचे मँझोले किसानों को ही मिलेगा। कारण यह है कि बड़े बैंकों या वित्तीय संस्थानों से कर्ज़ उन्हें ही मिलता है और सरकार वही कर्ज़ माफ़ कर सकती है, अगर वह करती है तो। ज़्यादातर ग़रीब किसान और खेतिहर मज़दूर तो गाँव के धनी सूदखोरों, आढ़तियों और धनी किसानों से ही ऋण लेते हैं, और वह ऋण कभी भी कर्ज़ माफ़ी की योजना के तहत नहीं आयेगा। अगर आँकड़ों की बात करें तो सबसे ज़्यादा आत्महत्या भी इन ग़रीब किसानों ने की है, जिनके पास दो-ढाई हेक्टेयर से कम ज़मीन होती है, या जो छोटी-सी ज़मीन पट्टे पर लेते हैं और फिर कर्ज़ लेकर खेती करते हैं। ज़ाहिर है, कर्ज़ माफ़ी का वायदा कांग्रेस, सपा और अन्य चुनावबाज़ पार्टियाँ केवल बेवकूफ़ बनाने के लिए कर रही हैं और इन पर कतई भरोसा करने की ज़रूरत नहीं है।
मज़दूरों और ग़रीब किसानों के प्रमुख मसलों पर भाजपा चुप है और कांग्रेस समेत अन्य चुनावबाज़ पार्टियाँ झूठे वायदे कर रही हैं। ऐसे में, आम मेहनतकश आबादी को चुनावों में क्या करना चाहिए? हमें भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के साथ जुड़ना चाहिए, उसका वालण्टियर बनना चाहिए और जहाँ कहीं भी उसके उम्मीदवार खड़े हैं, वहां उन्हें उसे एकजुट होकर वोट देना चाहिए। दिल्ली में उत्तर-पश्चिमी दिल्ली से साथी अदिति और उत्तर-पूर्वी दिल्ली से साथी योगेश, हरियाणा में कुरुक्षेत्र से साथी रमेश और रोहतक से साथी अरविन्द मज़दूर पार्टी के उम्मीदवार हैं। इन उम्मीदवारों को मज़दूर वर्ग को एकजुट होकर वोट देना चाहिए और जिताना चाहिए। केवल ऐसे उम्मीदवारों की विजय के ज़रिये मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसान आबादी अपने हक़ों के संघर्ष को आगे ले जा सकती है। केवल ऐसे मज़दूर वर्गीय सांसदों की संसद में मौजूदगी ही आपके क्षेत्र में मज़दूर और मेहनतकश आबादी के लिए तमाम सुविधाओं जैसे पीने के पानी, बिजली, शौचालय व साफ़-सफ़ाई, आदि का इन्तज़ाम कर सकती है और साथ ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि श्रम कानूनों को लागू किया जाय। केवल ऐसे मज़दूर प्रतिनिधियों की संसद में मौजूदगी के ज़रिये हम ठेका प्रथा को समाप्त करने, न्यूनतम मज़दूरी को कम से कम 20 हज़ार रुपये करने और उसे लागू करवाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए इन चारों उम्मीदवारों को जिताने के लिए आम मेहनतकश आबादी को एकजुट होकर वोट देना चाहिए और कांग्रेस, भाजपा, इनेलो, आम आदमी पार्टी जैसी पूँजीवादी चुनावी पार्टियों को सबक सिखाना चाहिए। जहाँ कहीं मज़दूर पार्टी इस बार अपने उम्मीदवार नहीं खड़े कर रही, वहां उसे खड़ा करने के प्रयास तुरत शुरू करने चाहिए।
