बवाना के मज़दूरों के जीवन की परिस्थिति के लिए जिम्मेदार हैं सभी पूँजीवादी चुनावी पार्टियाँ! मज़दूर पार्टी ही एकमात्र विकल्प है!

भाजपा और आम आदमी पार्टी इन फैक्टरियों में मज़दूरों के हक़-अधिकारों पर कुछ भी न बोले। क्योंकि मज़दूरों की लूट से बवाना के मालिक जो मुनाफा पीटते हैं उससे ही ये भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को चन्दा देते हैं। इसलिए ये मज़दूरों की मौत पर चुप ही रहेंगे।

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कांग्रेस किसकी पार्टी है?

कांग्रेस पार्टी देश के बड़े पूँजीपतियों की सबसे पुरानी पार्टी है। कांग्रेस ही वह पार्टी है जिसने ठेकेदारी, निजीकरण, उदारीकरण की नीतियों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने की शुरुआत 1991 में नयी आर्थिक नीतियों के साथ की थी।

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मुंडका इंडस्ट्रियल एरिया में मज़दूरों के नारकीय हालात और मज़दूर पार्टी का संकल्प

स्टील की फ़ैक्टरी में काम करने वाले मज़दूर खुले में काम करते हैं। उनके ऊपर छाँव तक की कोई व्यवस्था नही थी। कड़कती धूप और नीचे तपती लोहे की मशीन पर ये मज़दूर काम करते हैं। छुट्टी करने पर मालिक पैसे काट लेता है। RWPI के वालण्टियर को इलाके में काम में लगे एक दिहाड़ी मज़दूर ने बताया कि उनको कभी 350 तो कभी 250 रुपये तक दिहाड़ी मिलती है। लेकिन ये पक्का नहीं है कि काम मिलेगा या नही। बहुत मुश्किल से घर का काम चलता है। RWPI के वालण्टियरों ने चुनाव प्रचार करते हुए मज़दूरों से बात करने के लिए कई फैक्टरियों में अन्दर जाने की कोशिश की लेकिन वे कुछ ही में अन्दर जा पाए।

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सेना को “मोदी सेना” कहना आम सैनिकों का अपमान

मोदी राज में सैनिकों के हालात बताने वाली गृह मंत्रालय की रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि वर्ष 2014 से 2017 तक बीमारी के चलते 3221 जवान और अधिकारियों की मौत हो चुकी है। मोर्चे पर बीमारी के चलते मरने वाले जवानों में सबसे बड़ी संख्या सीआरपीएफ के जवानों की है। अलग-अलग मोर्चों पर 1489 जवान अभी तक दम तोड़ चुके हैं। वहीं 2018 में सेनाओं और अर्द्धसैनिक बलों के 104 जवानों ने आत्महत्या की, 2017 में 101 जवानों ने और 2016 में 129 जवानों ने आत्महत्या की थी। इनमें से ज़्यादातर मजदूरों, किसानों या कुछ मध्यवर्गीय घरों के युवा ही हैं। स्पष्ट है कि सैनिकों की इन मौतों के लिए जि़म्मेदार ताक़तें जब देशभक्ति और “राष्ट्रभक्ति” की बात करती हैं, तो उनके देश और “राष्ट्र” में आम मज़दूर, ग़रीब किसान और मेहनतकश नहीं होते! सच यह है कि उनके “राष्ट्र” में हम मेहनतकश कहीं नहीं हैं। हमारा काम सिर्फ यह है कि हम अम्बानियों-अडानियों के लिए मरते-खपते रहें, चाहे कारखानों, खलिहानों में या फिर सरहद पर।

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मोदी क्यों नहीं माँग रहे नोटबन्दी, जीएसटी और ‘अच्छे दिनों’ पर वोट?

नरेन्द्र मोदी अम्बानी-अडानी के पैसों के बूते हेलीकॉप्टरों में घूमघूमकर सभा करनी शुरू कर चुके हैं। इन सभाओं में पैसे दे-देकर भीड़ जुटाई जा रही है, फिर भी आधी कुर्सियाँ ख़ाली ही रह जा रही हैं। यही कारण है कि मोदी ज़्यादा चीख़-चिल्ला रहे हैं! चुनाव भारत का है, मगर वोट पाकिस्तान के नाम पर माँग रहे हैं! हिन्दू-मुसलमान, मन्दिर-मस्जिद, आदि सब पर बात हो रही है, लेकिन ‘अच्छे दिनों’ की बात नहीं हो रही है। यह शब्द मोदी को बुरे सपने की तरह सता रहा है।

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मोदी सरकार के दौर में न्यायपालिका की हालत

आम जनता के तो घरों के भीतर खुफियागीरी करने, उनके ईमेल, फेसबुक आदि पर निगाह रखने, उनके बैंक खातों पर निगाह रखने, उनके फ़ोन टैप करने में भी निजता का अधिकार भंग होता नहीं दिखता है सरकार और न्यायपालिका को, लेकिन जजों की सम्पत्ति को सूचना के अधिकार के तहत लाने से ही उनकी निजता भंग हो जाती है! सम्पत्ति की जानकारी को सार्वजनिक करने से कैसी निजता भंग होती है? ज़ाहिर है, मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के तीनों ही अंग यानी सरकार, नौकरशाही-सेना-पुलिस तथा न्यायपालिका आपस में मित्रतापूर्ण सहकार के साथ काम करते हैं। लेकिन ऐसा वे जनता के हितों में नहीं बल्कि जनता के विरुद्ध करते हैं।

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यह चुनाव आयोग है या भाजपा का चुनाव विभाग?

भारत के इतिहास में कभी भी चुनाव आयोग की ऐसी गयी-बीती हालत नहीं रही है। यह स्वाभाविक भी है। फ़ासीवाद की ख़ासियतों में से एक यह भी है कि यह पूँजीवादी जनवाद की तमाम “सम्मानित संस्थाओं” को अन्दर से खोखला बना देता है। पहले भी भारत में इन संस्थाओं की हालत ख़राब ही थी। लेकिन इज़्ज़त बचाने के लिए ये संस्थाएँ कुछ कदम उठाया करती थीं। लेकिन अब आप चाहे चुनाव आयोग पर निगाह डालें या फिर न्यायपालिका पर, ये मानो आज की फासीवादी शासक पार्टी भाजपा और नरेन्द्र मोदी के इशारों पर काम कर रहे हैं।

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जो ठेका प्रथा पूर्ण रूप से समाप्त करने की बात न करे, हर उस पार्टी का पूर्ण बहिष्कार करो!

कारण यह है कि ठेका प्रथा पूँजीपति वर्ग को हम मज़दूरों से नंगे तौर पर गुलामी करने का मौका देती है। ये सभी पार्टियाँ छोटे, मँझोले या बड़े पूँजीपति वर्ग की नुमाइन्दगी करती हैं। ये सभी पूँजीवादी और निम्न-पूँजीवादी यानी टटपुँजिया चुनावबाज़ पार्टियाँ इन्हीं छोटे, मँझोले और बड़े मालिकों के चन्दे पर चलती हैं। ज़ाहिर है, कि वे इन्हीं मालिकों और ठेकेदारों की ही सेवा करेंगी। माकपा, भाकपा आदि भी हमेशा ही मज़दूरों से ज़्यादा छोटे मालिकों, व्यापारियों आदि के लिए टेसू बहाती रहती हैं। यहाँ उनकी पक्षधरता बिल्कुल साफ़ हो जाती है। ऐसे में, इन तमाम पूँजीवादी और टटपुँजिया चुनावबाज़ पार्टियों से यह उम्मीद करना कि वे ठेका प्रथा को समाप्त करेंगी, एक मूर्खतापूर्ण सपना होगा।

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मेहनतकश जनता अपना स्वतन्त्र विकल्प खड़ा करके ही फासीवादी मोदी सरकार को हरा सकती है!

पूरे देश में मोदी सरकार के पाँच वर्षों में मज़दूरों-मेहनतकशों के जीवन में आयी तबाही के कारण मोदी सरकार के खि़लाफ़ ज़बर्दस्त असन्तोष है। भाजपा और संघ परिवार इस असन्तोष से डरकर ही साम्प्रदायिक प्रचार और अन्धराष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीट रहे हैं। लेकिन आप किसी भी कीमत पर साम्प्रदायिकता और अन्धराष्ट्रवाद के झाँसे में न फँसें। भाजपा और संघ परिवार के ‘राष्ट्र’ में आपका कोई स्थान नहीं है। राष्ट्रवाद की सोच वास्तव में अम्बानी-अडानी जैसे पूँजीपतियों की सेवा करती है। यही कारण है कि जब भी मज़दूर और मेहनतकश अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो भाजपा और संघ परिवार उनके आन्दोलन को “राष्ट्र-विरोधी” करार दे देते हैं। “राष्ट्र” क्या है? यह पूँजीपति वर्ग की कल्पना है जिसका इस्तेमाल वह हमें झाँसे में डालने, भटकाने और कुचलने के लिए करता है।

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क्या मोदी मज़बूत नेता है?

मोदी सरकार के कार्यकाल में आतंकवादी हमलों में 94 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। भारत के इतने सैनिक किसी अन्य शासन में नहीं मरे जितने कि अकेले मोदी राज में मरे हैं। क्या यह “मज़बूत” नेता की निशानी है?

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